Asthma Causes, Symptoms and Ayurvedik Treatment in Hindi | Asthma ka Karan, Lakshan aur Gharelu Upay

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  • Asthma Treatment in Ayurved in Hindi
  • श्वास रोग में पथ्या पथ्य 

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    Asthma (श्वास रोग) 

    जिस तरह भागनेसे लगातार और जल्दी जल्दी साँस आता है; अगर उसी तरह आराम से बैठे रहने पर भी साँस आवे, तो उसे "दमा" या " श्वास रोग" कहते हैं।


    Asthma (श्वास रोग) का वर्णन | सम्प्राप्ति ।

    "सुश्रुत” में लिखा है: - प्राण वायु अपनी प्रकृति के विरुद्ध होकर, कफ से मिल कर और उगामी होकर श्वास रोग पैदा करता है। 

    "भावप्रकाश" में लिखा है-

    यदास्रोतांसि संरुध्य मारुतः कफपूर्व्वकः ।

    विजाति संरुद्धस्तदा श्वासं करोति सः ॥

    जब वायु कफ से मिल जाता है, तब वह उस कफ से प्राण, अन्न और जल के होने वाली वाहिनियों (मार्गों) का रोक देता है। उस अवस्था में वायु आप भी, कफ की वजह से, चारों ओर घूम नहीं सकती। जब वह अपनी इच्छानुसार चारों तरफ नहीं विचर सकती, तब श्वास रोग पैदा करती है।

    मतलब यह है कि जब वात और कफ के कुपित होने से श्वास वाही यंत्र कफ से ढक जाते हैं, तब हवा के घूमने को ज़गह नहीं मिलती, कफ के कारण वायु आ जा नहीं सकती, तब श्वास रोग होता है। असल में हवा आने-जाने की राहों में कफ के आड़े आ जाने से श्वास रोग होता है।

    अथवा यों समझिये कि जब श्वास बहाने वाली नालियों में कफ भर आता है, जब वे धातु से सूख कर या खुश्क होकर खरदरी हो जाती हैं या सुकड़ जाती हैं अथवा ज़ियादा चौड़ी हो जाती या फैल जाती है, तभी श्वास रोग होता है।

    नोट - हिचकी और श्वासमें क्या भेद है? 

    हिचकी रोग प्राण वायु और उदान वायु दोनों के कुपित होनेसे होता है; पर श्वास रोग केवल " प्राण वायु " की गड़बडी से होता है । हिचकी रोग बिना श्रामाशय की ख़राबी के नहीं होता; पर श्वास रोग में; आमाशय में कोई ख़राबी नहीं होती । हिचकी रोग में आमाशय में विकार होते हैं; पर श्वास रोग में हृदय यानी छाती, फेंफड़े और श्वास नली में विकार होते हैं। 

    आमाशय और कंठ में उदान वायु रहता है। वही उदान वायु कुपित होकर प्राण वायु से मिलता और हिचकी राग करता है। पर श्वास रोग में हृदय में विकार होते हैं आमाशय में नहीं और प्राण वायुका स्थान हृदय है। अतः श्वास राग में 'प्राणवायु' ही प्रधान है। 

    बस यही हिचकी और श्वासमें फर्क है। खुलासा यह है कि हिचकी का सम्बन्ध आमाशय से है; पर श्वास रोगका छाती, फेंफड़े और श्वास नली से। हिचकी पैदा करने वाले प्राणवायु और उदानवायु दो हैं; पर श्वास रोग पैदा करनेवाला अकेला “प्राणवायु" है।



    Asthma (श्वास रोग) के कारण | Causes of Asthma in Hindi

    नीचे लिखे हुए कारणों से श्वास रोग होता है

    (१) दाह करने वाले, देर से पचने वाले, दस्त को रोकने वाले, रूखे और रस वाहिनी शिराओं को रोककर भारीपन करने वाले पदार्थों के अधिक सेवन से ।

    (२) शीतल जल पीने और शीतल अन्न अधिक खाने से

    (३) धूल और धुएं के मुँह और नाक में जाने से,

    (४) अत्यन्त हवा लगनेसे,

    (५) अत्यन्त मिहनत के काम करने से,

    (६) भारी बोझ उठाने से,

    (७) बहुत राह चलनेसे,

    (८) मल-मूत्र आदि के वेग रोकने से

    (६) उपवास आदि अधिक करने से हिचकी, श्वास और खाँसी रोग पैदा होते हैं।

    नोट - हिचकी रोग और श्वास रोग के एक ही कारण है अर्थात् जिन कारणों से हिचकी रोग होता है, उन्हीं बहुत से कारणों से श्वास रोग होता है। 

    महर्षि वाग्भट्ट ने और भी अस्थमा के कारण  लिखे हैं 

    कासवृद्धया भवेच्छ्वासः पूर्वैर्वा दोषकोपनैः। 

    आमातिसार वमथु विष पाण्डु ज्वरैरपि ॥१॥ 

    रजो धूमानिलैर्मर्मघातादति हिमाम्बुना

    क्षुद्रकस्तमकश्छिन्नो महानूर्ध्वश्च पञ्चमः ॥ २ ॥


    कासरोग के बढ़ने से श्वासरोग होता है अथवा पहले सर्वरोगनिदान नामक (अ.हृ.नि. के प्रथम ) अध्याय में कहे गये वात आदि दोषों को प्रकुपित करने वाले तिक्त तथा दाह कारक आदि पदार्थों के सेवन करने से, इनके अतिरिक्त कभी-कभी आमातिसार, वमन, विषज विकार, पाण्डुरोग अथवा ज्वर से भी श्वासरोग हो जाता है और धूलि से, अधिक धूप से, ठण्डी हवा के लगने से, मर्मस्थानों पर चोट लगने से, अत्यन्त शीतल बरफ का पानी पीने से अथवा बरफ की कुल्फी या आइसक्रीम जैसे पदार्थों को खाने या चूसने से भी श्वासरोग की उत्पत्ति हो जाती है॥१॥


    योगरत्नाकर और वाग भट्ट जी का इसमें एक मत यह है के आमातिसार, वमन, विष, पांडुरोग, और ज्वररोग के कारण भी श्वास रोग होता है। 



    Symptoms Before Asthma Disease श्वास रोग के पूर्वरूप निम्नलिखित हैं:-

    (१) हृदय में पीड़ा।

    (२) छाती में शूल(दर्द) 

    (३) अफारा।

    (४) मुख का स्वाद ख़राब होना

    (५.) कनपटियों में तोड़ने की सी पीढ़ा होना।

    यो समझिये कि जिसे श्वास(दमा) होने वाला होता है, उसके शरीर में, श्वास रोग होने से पहले ये खुराबियाँ नजर थाती है; यानी हृदय और छाती में दर्द होता है, शूल चलते हैं, पेट फूल जाता है, मुंह का जायका खराब हो जाता है अथवा किसी चीज का स्वाद नहीं आता और कनपटियों में ऐसा दर्द होता है मानों उन्हें कोई तोड़ता हो । जब ये लक्षण नजर आयें, तभी समझ लेना चाहिये कि "श्वास साहब" अस्थमा रोग तशरीफ लाने वाले हैं।


    Types of Asthma in Ayurveda

    अस्थमा (दमा) जिसे आयुर्वेद में श्वास रोग कहा गया है आयुर्वेद में इसे 5 तरह का बताया गया है।  

    १. तमकश्वास

    २. महाश्वास 

    ३. ऊर्ध्वश्वास

    ४. छिन्नश्वास 

    ५. क्षुद्रश्वास



    तमक श्वास के लक्षण | Symptoms of Asthma  

    जो लक्षण तमक श्वास के हैं वही आजकल लोग जिसे अस्थमा कहते हैं उसी के हैं. 

    जब वायु अपनी राह छोड़कर फुराहों से नसों में घुसता है, तय वह गर्दन और सिर को जकड़ कर, कफ को बढ़ाकर, बढ़ाये हुए कफ से नाक में पीनस या जुकाम, कण्ठ में घर-घर शब्द और हृदय को पीड़ित करने वाला तीव्र श्वास रोग पैदा करता है।

    जिसे तमक श्वास होता है, वह अपने तई घोर अन्धकार में पढ़ा हुआ देखता है, त्रास पाता है, श्वास के वेग से चेष्टा रहित हो जाता है और खाँसी आने से बारम्बार बेहोश जैसा होता है। जब उसके गले से कफ निकलने लगता है, तब उसे बढ़ी भारी तकलीफ होती है; लेकिन जब कफ निकल जाता है, तब थोड़ी देरको उसे चैन आ जाता है।

    तमक श्वास वाले के गले में दर्द होता है, श्रतः उसे बोलने में कष्ट होता है। जब वह सोता या लेटता है, तब - वायुकी वजह से- पसलियों में घोर पीड़ा होती है, अतः वह फौरन उठ बैठता है । उठकर बैठ जाने से कुछ आराम मिलता है। यही वजह है कि तमक श्वास रोगी, रातभर तकिया सामने रखे बैठे रहते हैं।

    तमक श्वास रोगी गरम चीज़ों की इच्छा करता है। उसके नेत्र ऊँचे-ऊँचे और सृजे से रहते हैं, सिर में पसीने आते हैं, मुख दुखा करता है, अत्यन्त वेदना होती है और रोगी वारम्वार श्वास ले लेकर हाथी पर बैठे हुए फीलवान की तरह हिलता है।

    तमक श्वास बादल होने से, पानी  बरसने से, सर्दी पड़ने से, पुरवाई हवा चलने से और कफ कारक पदार्थ खाने-पीनेसे चढ़ता है।

    तमक श्वास याप्य या कटसाध्य है। बड़ी बड़ी दिक्कतों से आराम होता है। अगर नया होता है, तो कदाचित साध्य भी होता है; यानी नया होने से उत्तम चिकित्सा द्वारा आराम हो जाता है ।

    तमक श्वास वाला श्वास के वेग के मारे चेष्टाहीन हो जाता है, यह चरक मुनि का मत है । तमक श्वास वाला गरम चीजें चाहता है, क्योंकि यह श्वास "वात कफ" से पैदा होता है ।

    "सुश्रुत" में लिखा है अगर प्यास बहुत हो, पसीने आयें, कय हों, गले में कफ घर-घर घर-घर श्रावाज़ करता हो और विशेष कर बरसात के दिनों में, सर्दी से श्वास का वेग बढ़ जाय तो उसे " तमक श्वास" समझो।

    अगर श्वासके साथ खर्राटे का शब्द हो, खाँसी और कफ का ज़ोर हो, बल घट गया हो, अन्न न भाता हो और सोने से तकलीफ मालूम होती हो तो दुःखदायी "तमक श्वास" समझो ।


    "वैद्यविनोद" में लिखा है:-

    आसीन उपलभतेच सोल्यं, सुप्तस्य पार्श्वेपरिगृह्मनाः ।

    आध्मापयेतं तमकं वदन्ति, मेघाम्बु शीतैः सहयाति वृद्धिम् ॥


    तमक श्वास रोगी बैठे रहने से और गरम पदार्थों से सुख पाता है, क्योंकि सोने से वायु उसके पसवाड़ों को पकड़कर पेट को फुला देता है। तमक श्वास वर्षा और शीत से बढ़ता है।


    Asthma means तमक श्वास- इसकी साफ पहचान ये हैं:-

    (१) तमक श्वास रोगी सो नहीं सकता, साने से उसे तकलीफ होती है, पर बैठने से उसे आराम मिलता है।

    (२) तमक श्वास वाले का श्वास बादल होने से, वर्षा होने से, पूरब की हवा चलने से और सरदी पड़ने से बढ़ता है ।

    (३) तमक श्वास वाले का श्वास कफकारी पदार्थों से बढ़ता है, अतः उसे सर्द पदार्थों से कष्ट होता है; पर गरम पदार्थों से उसकी "कष्ट कम होता और सुख मालूम होता है ।

    तमक श्वास "वातकफ" से होता है, इसी से गरम पदार्थों से शान्त होता है।

    प्रतमक स्वास के लक्षण

    जिस तमक श्वास में मूर्च्छा और बुखार भी होते हैं, उसे "प्रतमक श्वास" कहते हैं। 



    महाश्वास के लक्षण

    जिसे महाश्वास होता है, उसकी प्राण वायु आवाज़ करती हुई ऊपर की ओर चढ़ती है। प्राण वायु के ऊपर की और बढ़ने से रोगी को घोर दुःख होता है ।

    जिस तरह भागने से रोका हुआ साँड साँस लेता है अथवा कुछ दिनों से मैथुन कर्म न करने वाला साँड साँस लेता है; उसी तरह "महाश्वास" रोगी साँस लेता है।

    महाश्वास वाले के ज्ञान-विज्ञान सब नष्ट हो जाते हैं। वह अपने पढ़े हुए शास्त्रों को भूल जाता है। महाश्वास वाले की आँखों में भ्रम हो जाता है। उसके नेत्र चञ्चल या फटे से हो जाते हैं, मल-मूत्र रुक जाते हैं, न पाखाना(लैट्रिन) होता है और न पेशाब उसकी जीभ तुतला जाती है बोला नहीं जाता। अगर बोलता है, तो बहुत ही मन्दी आवाज़ निकलती है। श्वास की आवाज़ दूर से ही सुनाई पड़ती है।

    जिस रोगी में ये सब लक्षण मिलते हैं, उसे महाश्वास का रोगी कहते हैं । ऐसे लक्षणों वाला रोगी या तो बहुत कष्ट से ठीक होता है।

    "सुश्रुत" में लिखा है। जब मनुष्य बेहोश हो जाय, पसलियों दर्द हो, कंठ या गला सूखे, श्वास में खर्राटे की आवाज जियादा आवे, नेत्रों में सूजन या सुर्खी हो और साँस लेते समय मनुष्य ढीला हो जावे अथवा फैल या सुकड़ जावे- तब समझो कि " महाश्वास" है। 

    वाग्भट्ट महाराज महाश्वास रोग में कान, कनपटी और सिर में दर्द होना ज्यादा लिखते हैं।



    उर्ध्व श्वास के लक्षण

    जिसे उर्ध्व श्वास होता है, उसका श्वास बहुत ऊँचा चढ़ता है, कभी नीचे नहीं आता। उर्ध्व श्वास वाले के शरीर के सारे छेद और मुँह कफ से घिर जाते हैं। वायु को स्वतंत्र रूप से घूमने को राह नहीं मिलती, इसलिए वह कुपित होकर घोर पीड़ा करता है।

    उर्ध्वश्वास में नीचे को साँस नहीं लिया जाता। जिस उर्ध्व श्वास वाले को मोह और ग्लानि होती है, वह मर जाता है। सब तरह के श्वासों में यह श्वास बहुत ऊँचा चढ़ता है। यही इस में विशेषता है।

    "सुश्रुत" में लिखा है, उर्ध्वश्वास वाला जब श्वास लेता है, उसके सस्थान खिंचने लगते हैं; वह बारम्बार बेहोश और मृच्छित होकर श्वास लेता है; ऊपर की तरफ देखता है और श्वास की आवाज मन्दी पड़ जाती है।

    "वाग्भट्ट" में लिखा है, जो लम्बे-लम्बे साँस ऊपरको लेता है, नीचे की ओर साँस नहीं लेता, ऊपर की तरफ देखता है और इस तरह चिल्लाता और विलाप करता है, गोया मर्मस्थानों में चोट लगती हो, वह “उर्ध्वश्वाल रोगी” है। 

    “वैद्यविनोद" में लिखा हैः- वासवदतस्तदा वा नियमतिद्वन्ति।

    जब उर्ध्वश्वास कुपित होता है, तब वह नीचे के साँस को रोक कर जीव का नाश कर देता है।

    खुलासा यह है कि, उर्ध्वश्वास-रोगी ऊपर की ओर लम्बे साँस लेता है, नीचे की ओर साँस नहीं लेता; क्योंकि ले नहीं सकता। वजह यह है, कि उसके पेट में वायु नहीं समाता । इस श्वास में वायु का कोप ज़ियादा रहता है, अतः रोगी के नेत्र स्थिर नहीं रहते चंचल रहते हैं। रोगी इधर-उधर देखता है।  शरीर में दर्द और बेचैनी की हद नहीं रहती । अथ श्वास नीचे की तरफ रुक जाता है, तब रोगी बेहोश हो जाता है। अगरं वारम्वार श्वास रुकता और बेहोशी होती है, तो रोगी इसी श्वास से मर जाता है।




    छिन्न श्वासके लक्षण

    जिसे चिन्न श्वास होता है, वह अपनी तमाम ताकत से रह रह कर श्वास लेता है। छिन्न श्वास वाले के हृदय छाती और सि रमें ऐसा दर्द होता है, मानों कोई छेदे डालता है। वह समय पर जब श्वास लेना चाहिये तब साँस ले नहीं सकता। पेट फूलने, पसीने आने, बेहोशी होने और मूत्राशय पेशाब की थेली जलन होने से निहायत दुःखी रहता है।
     
    नेत्र जल से भरे रहते हैं। शरीर अत्यन्त क्षीण हो जाता है। रोगी के चित्त में उद्वेग होता है। वह वृथा बकवाद करता और निरन्तर हाँफता रहता है । उसका मुँह सूखता है। शरीरका रंग बिगड़ जाता है अथवा बदल जाता है और 'एक' आँख लाल हो जाती है।

    "सुश्रुत" में लिखा है, जिस रोगी के पेडू में जलन होने से पेट फूल जाता है और वेदना भी होती है, सारा प्राण वायु रुक-रुककर चलता है यानी टूट-टूट कर साँस आता है, उसे “छिन्न श्वास रोगी" कहते हैं । 

    "वैध विनोद" में लिखा है :-
    छिन्न श्वासेन शुष्कास्यो विच्छिन्नो विलपन्नरः । वितयः स शी विमहात्पसून ॥
    छिन्न श्वास रोगी थोड़ा-थोड़ा और ठहर-ठहर कर साँस लेता है, उसका मुँह सूखता है, वह विलाप करता और उद्विग्न होता है तथा उसकी आँखें डवडवायी सी रहती हैं। 

    वाग्भट्ट इतना अधिक लिखा है कि, छिन्न श्वास वाले की नज़र नीचे को रहती है और नेत्र एक जगह अनवस्थित रहते हैं।
    मतलब  यह कि छिन्न श्वास वाला रह-रहकर साँस लेता है, लगातार साँस नहीं लेता; यानी उसका साँस टूट-टूट कर आता है। जब वह साँस लेता है, तब उसके हृदय आदि मर्मस्थानोंमें काटने या छेदने की सी पीड़ा होती है । उस पीड़ा की वजहसे ही उससे साँस लिया नहीं जाता। नाभि के नीचे पेडू में अत्यन्त जलन होती है, आखो में पानी सा भरा रहता है, चेष्टा बदल जाती है और रोगी आन तान बकता है। इस रोगीको एक लाल जाती है। रोग का प्रभाव ज्यादा हो तो दोनों भी दो सकती है। 



    क्षुद्रश्वास के लक्षण

    जो श्वास रुखेपन और बड़ी भारी मिहनतसे पैदा होता है, उसे -" क्षुद्र श्वास" कहते हैं। यह श्वास वायु को बढ़ाता है; पर और श्वासों की तरह, रोगी को बहुत दुःखित और पीड़ित नहीं करता, अन्न-पानों की गति को नहीं रोकता — खाने पीने में बाधा नहीं डालता और - इन्द्रियोंको पीड़ित नहीं करता। यह श्वास रोग साध्य होता है, आसानी से श्राराम हो जाता है। 
    "भाव प्रकाश" में लिखा है, महाश्वास आदि चारों श्वासों के लक्षण यदि प्रकट न हुए हों, तो वे भी साध्य होते हैं।
     "वाग्भट्ट कहते हैं" कि, बहुत ही ज़ियादा खा लेने से जब वायु - कुपित हो जाता है, तब वह बिना किसी प्रकार के इलाज के आप ही आराम हो जाने वाले "क्षुद्र श्वास" को करता है।
     
    “वैद्यविनाद” में लिखा हैः-
    रक्षापानरायासययु मुद्रमुदीरयेत्।
    क्षुद्रश्वासो मतस्तेन न च दुःखकरो हि सः ॥

    रूखे अन्न-पान या रुखे भोजन के पदार्थों और अत्यन्त परिश्रम से  जो श्वास रोग होता है, वह वायु को तो बढ़ाता है, पर बहुत तकलीफ नहीं देता।


    Asthma Treatment in Ayurved in Hindi


    अस्थमा का दौरा रोकने के सरल उपाय | दमा या अन्य श्वास का दौरा आने पर किये जाने वाले उपाय 

    (१) श्वास का दौरा होते ही, वैद्यको चाहिये कि रोगीको - जिस तरह आराम और सुविधा मालूम हो, उसी तरह उसे पलंग या बिछौने वगैरः पर अच्छी तरह बिठावें, पर इस बातपर विशेष ध्यान रहे कि, रोगी के कमरे में हवा का आना-जाना बन्द न हो। यदि ठण्ड का मौसम हो तो सीधी ठंडी हवा भी नहीं लगनी चाहिए और हवा का आना जाना भी बंद ना हो ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए। 
    (२) रोगी जितना सह सके उतने गरम जल में, एक कपड़ा या - फलालैन का टुकड़ा भिगो कर उससे १०।१५ मिनट तक रोगी को छाती को सेके।
    अथवा
    थोडा सा सेंधानमक गाय के धी में खूब महीन पीस कर रोगी की छाती के बीच से गले तक मले।
    (३) रोगी सह सके उतना गरम जल एक चौड़े और गहरे वर्तन मैं भर कर उसमें रोगी के दोनों पैर रखवावे। इस उपाय से श्वासका ज़ोर फौरन घट जाता है।

    Asthma Attack Treatment at Home No Inhaler

    👉१०/१५ बिना बीज के मुनक्के कुचल कर आधपाव दूध और आधपाव पानी में औटाओ; जब पानी जल जाय, मल कर छान लो। फिर ऊपर से ४|५ काली मिर्च का चूर्ण और एक तोले मिश्री मिला कर, गरमा गरम, थोड़ा-थोड़ा, तीन चार बार में, चमचे से पिला दो। 
    👉पाँच-सात बादामों की सफेद मिंगी पानी में पीस कर, कपड़े में छान ले। और आग पर खूब औटा कर थोड़ा-थोड़ा रोगीको पिलाओ।
    👉तीन चार ताले अंगूरों का रस निकाल कर कुछ गरम करों और रोगी को पिलाओ।
    👉केवल गरम दूध या केवल गरम पानी ही रोगी को पिलाओ। इन सभी उपायोंसे कफ पतला होगा और श्वासका वेग या ज़ोर घट जायगा।
    👉वंसलोचन २ माशे, छोटी इलायची २ माशे और गिलोय का सत्त २ माशे लेकर एकत्र पीस ले। फिर २ तोले शहद और २ तोले दाख- दोनों का एकत्र अवलेह बनाकर, यानी दोनों को मिला कर, उसमें ऊपरकी पिसी हुई दवाएँ मिला दो और रोगीको ३-४ बार चटाओ। उससे भी कफ पतला हो जाता है ।
    👉कफाधिक्य श्वास के दौरे में, ६ माशे अदरक का रस और ६ माशे 'शहद मिलाकर चटाओ।

    Note- यह सब सहायक उपचार हैं और इनको तभी आजमाएं जब रात बी रात कोई वैध डॉक्टर ना हो। केवल इनके भरोसे भी ना रहें। 


    Asthma Ka Ayurvedic Mein Ilaj - Yogratnakar

    अस्थमा ठीक करने के लिए काढ़े 

    शृङ्गवेर क्वाथ
    दो तोले सोंठ को बत्तीस तोले पानी में औटाओ; जब आठ तोले जल रह जाय, मल कर छान लो शीतल होने पर उसमें ६ माशे "शहद " मिलाकर पीलो कई रोज इस काढ़े के पीनेसे श्वास, सर्दी की खाँसी और सर्दी का जुकाम में निश्चय ही आराम हो जाते हैं। ।। ची. च ।। 

    कुल्थादी: क्वाथ
    कुल्थी, सोंठ, छोटी कटेरी और अरुसा इन सभी को बराबर मात्रा में चूर्ण कर काढ़ा बना कर उसमे पुहकर मूल का चूर्ण मिला कर पीने से सभी श्वास रोग और खांसी रोग नष्ट होते हैं। ।। यो. र ।।

    देवदार्वादी क्वाथ
    देव दारु, वच, छोटी कटेरी, सोंठ, कायफल, पुहकर मूल सभी औषधियों को बराबर मात्रा में लेकर काढा बना कर सेवन करने से खांसी और श्वास रोग जड़ से नष्ट होता है। ।। यो. र ।।

    वैधविलासात क्वाथ | सिंहादि क्वाथ
    छोटी कटेरी, हल्दी, अरूसा, गिलोय, सोंठ, पीपरी, भारंगी और नागरमोथा इन सभी का चूर्ण बराबर लेकर काढ़ा बना कर पीपरी और काली मिर्च की दो दो चुटकी चूर्ण मिला कर सेवन करने से श्वास रूपी वनाग्नि को मेघ के सामान नष्ट करता है। ।। यो. र ।।

    वैधजीवनात | वासादि क्वाथ
    अरूसा, हल्दी, धनिया, गिलोय, वबनेठी (भारंगी), पीपरी, सोंठ और छोटी कटेरी सभी को बराबर मात्रा में चूर्ण लेकर काढ़ा बना कर काली मिर्च का चूर्ण मिला कर सेवन करने से किस पुरुष का श्वास रोग शांत नहीं होता? अर्थात सब का शांत होता है। ।। यो. र ।।

    भारंग्यादि क्वाथ 
    केवल भारंगी और सोंठ को बराबर मात्रा में लेकर चूर्ण कर काढ़ा बना कर सेवन करने से श्वास रोग शांत हो जाता है।  ।। यो. र ।।

    द्राक्षादि क्वाथ
    दाख, गिलोय, सोंठ और पीपरी इन चार औसधियों का चूर्ण कर काढ़ा बना कर सुबह रात खाली पेट सेवन करने से बहुत से रोग ठीक होते हैं जैसे अस्थमा, शूल. खांसी, मंदाग्नि, जीर्णज्वर और तृष्णा रोग(बार बार प्यास का लगना) आदि सब शांत हो जाते हैं।  ।। यो. र ।।



    अस्थमा ठीक करने के लिए चूर्ण


    कुष्माण्डादि चूर्ण
    श्वेत कुष्माण्ड की जड़ को लेकर चूर्ण बना कर उष्णोदक याने पानी को खूब गर्म करलो जब आधा बच जाये तो उसे उष्णोदक कहते हैं। जब यह हल्का निवाया बच जाये इसके साथ इस चूर्ण की आधी से लेकर एक चमच्च चूर्ण की सुबह शाम खली पेट सेवन करने से कठिन खांसी और श्वास रोग में शीघ्र ही लाभ होता है। 

    शृङ्गयादि चूर्ण 
    काकड़सिंगी, सोंठ  काली मिर्च, पीपरी, आंवलाहरड़, बहेड़ा, छोटी कटेरी, भारंगी अलग पाँचों नमक, सभी को बवरबर मात्रा में लेकर चूर्ण कर आपस में मिला कर रख लें। उष्णोदक जल क साथ इस चूर्ण की आधी से लेकर एक चमच्च चूर्ण की सुबह शाम खली पेट सेवन करने से कठिन श्वास रोग, हिचकी रोग, अधर्ववात, खांसी, अरुचि (भूख की कमी) और पीनस(जुखाम) इन सबको नष्ट करता है। 

    शट्यादि चूर्ण 
    कचूर, भारंगी, वच, सोंठ  काली मिर्च, पीपरी, हरड़, रोचक लवण, कायफल, तेजबल, पुहकरमूल और काकड़सिंगी इन सभी के चूर्ण को बराबर मात्रा में लेकर चूर्ण बना कर आपस में मिक्स करके रख लें। आधी से एक चमच्च चूर्ण उस से तीन गुना शहद के साथ पेस्ट बना कर सुबह शाम खली पेट चाटने से खांसी और श्वास रोग जाते रहते हैं। 

    गुड़ादी चूर्ण 
    पुराण गुड़, काली मिर्च,  हल्दी, रास्ना, दाख, पीपरी इन सभी का चूर्ण बराबर मात्रा में लेकर आपस में मिला कर इसकी आधी से एक चमच्च चूर्ण उस से तीन गुना ज्यादा सरसों के तेल में मिला कर सुबह श्याम खाली पेट सेवन करने से अति तीव्र श्वाश रोग का नाश होता है। 

    शुण्ठ्यादि चूर्ण
    इलाइची के दाने एक भाग, दालचीनी दो भाग, पान के पत्ते तीन भाग, काली मिर्च चार भाग, पीपरी पांच भाग और सोंठ  ६ भाग लेकर चूर्ण बना कर आपस में मिला लें। यह जितना चूर्ण बने उन सबके बराबर ही इसमें देशी खांड मिला लें। इस चूर्ण की एक चमच्च सेवन हलके गुनगुने पानी के साथ सुबह श्याम खाली पेट सेवन करने से बवासीर, मंदाग्नि, गुल्म, अरुचि, श्वाश रोग, कंठ के सभी रोग और हृदय के रोगो में अत्यंत हितकर है। 

    मर्कटबीज चूर्ण
    कोंच के बीज को लेकर चूर्ण बना कर आधी चमच्च कटोरी में डाल लें, उसी में आधी चमच्च घी और दो चमच्च शहद मिला लें। इस अवलेह का सेवन सुबह खाली पेट सेवन करने से श्वास रोगी मनुष्य  करता है? अर्थार्त ठीक हो जाता है।



    अस्थमा ठीक करने के लिए अवलेह 


    गुड़ावलेह 
    पुराना गुड़ एक चमच्च लेकर उसमे एक चमच्च सरसों का तेल मिला कर सुबह शाम खाली पेट चाटने से २१ दिन में श्वास निर्मल हो जाते हैं। 

    द्राक्षाहरीतक्यादि लेह 
    दाख, हर्रा, नागरमोथा, काकड़ासिंगी, जवासा इनको समान लेकर विधिवत् चूर्णकर कर आधी चमच्च चूर्ण, शहद (दो चमच्च) और घृत(आधी चमच्च) के साथ लेह बनाकर चाटने से भयंकर श्वास भी नष्ट होता है। 

    हरिद्रावलेह 
    हल्दी, काली मिर्च, दाख, पुराना गुड़, रास्ना, कचूर, पीपरी इन सभी के चूर्ण को बराबर मात्रा में लेकर आपस में मिक्स करके रख लें। इस चूर्ण कीआधी चमच्च चूर्ण लेकर उसमे उतना ही सरसों का तेल मिला कर अवलेह बना कर सुबह श्याम खाली पेट चाटने से प्राणनाशक श्वास में भी लाभ जाता है। 

    भारंग्यादि अवलेह 
    भारंगी और सोंठ दोनों के बराबर मात्रा में चूर्ण बना कर आपस में मिला कर रख लें। इसकी एक चौथाई चमच्च चूर्ण लेकर अदरक के रस में मिला कर अवलेह बना कर भयंकर श्वास रोग इस प्रकार नष्ट होता है जैसे जांगल में सिंह सबको नष्ट कर देता है। 

    क्षुद्रावलेह
    यह बाजार में बना बनाया भी आता है। क्षुद्रावलेह के लाभ- कफ के सभी रोग, श्वास रोग, पाँचों प्रकार के खांसी के रोग, हिचकी, शोथ(सूजन) रोग, छाती के रोग और मिर्गी यह सभी नष्ट होते हैं। 

    चित्रक हरीतकी अवलेह 
    यह भी बाजार में बना बनाया आता है।  चित्रक हरीतकी अवलेह के लाभ- शोथ, TB, बवासीर, कुष्ठ, पीनस, श्वास, आंतो के रोग, कृमि रोग और गुल्म यह सभी रोग ठीक होते हैं। 

    श्वास कुठार रस 
    यह बाजार में बना बनाया भी आता है। श्वास कुठार रस के लाभ- खांसी, श्वास रोग, मंदाग्नि, वात और कफ के सभी रोग ठीक होते हैं। मूर्छा, मिर्गी और दिमागी रोगो में इसका वैध लोग नस्य करवाते हैं। 


    Asthma ठीक करने के लिए घरेलु इलाज

    👉पीपर और पोहकरमूल शहद में चाटने से श्वास रोग चला जाता है।

    👉कैथ का रस शहद में मिलाकर चाटने से दमा जाता रहता है ।

    👉कैथ के रस में आंवला, पीपर और सेंधानान मिला कर चाटने से श्वास रोग जाता रहता है।

    👉गेरू, रसौत और छोटी पीपर शहद में मिला कर चाटने से श्वास रोग जाता रहता है ।

    👉कचूर पोहकरमूल और आंवला शहद में मिलाकर चाटने से श्वास रोग जाता रहता है।

    👉पीपर, पीपरामूल, हरड़, चीता और वायविडंग - इनको समान समान लेकर पानी के साथ सिलपर पीस लो। फिर इसे घी की हाँडीके भीतर ल्हेसकर सुखा लो । सुखने पर हाँडी में माठा भर दो और एक सहीने तक एक जगह रखा रहने दो। यह माठा अग्नि दीपक और श्वास-खाँसी नाशक है।

    👉काली मिर्च और हल्दी समान समान लेकर पीस छान से इसकी मात्रा ३ माशे की है। एक-एक मात्रा ३ माशे शब्द और ३ माशे मिश्री में मिला कर चाटने से सब तरह के श्वास और पेट का भयंकर अफारा में भी आराम हो जाते हैं ।

    👉भारंगी को ना-बराबर शहद और घी में चाटने से श्वास जाता रहता है ।

    👉शहद मिलाकर जौ की धानी चबाने से श्वास रोग आराम हो जाता है।

    👉नीम के बीज और कदम के बीज पीस कर और "शब्द" से मिला कर चाटने और ऊपर से चाँवलों का भिगोया- पानी पीने से श्वास रोग जाता रहता है ।

    👉आक के नर्म-नर्म पत्तों का रस निकाल कर उस रस में जौ भिगो कर सुखा हो और फिर सत्तू बनाओ। इस सत्तू को शहद के साथ खाने से श्वास जाता रहता है।


    👉इलाइची और काली मिर्च बराबर-बराबर लेकर, अदरक के स्वरस में घोट कर उड़द के समान गोलियाँ बनालो सवेरे ही नित्य १ या २ गोली खाने से दमा दूर हो जाता है।

    👉केले के भीतर का रेशे वाला हिस्सा कुरेद कर उसमें कुछ काली मिर्च रख दो। सवेरे ही उन्हें केले से निकाल कर मन्दी आग पर भूनो और खालो इस उपाय से श्वास चला जाता है।


    अस्थमा ठीक करने एक लिए परीक्षित नुस्खे

    👉रेवन्दचीनी, एलुआ(इलाइची) और भुना सुहागा-समान- समान -लेकर, कसौंदी के रसमें घोट कर, चने-समान गोलियाँ बना कर सुखा लो। सवेरे-शाम एक-एक गोली  खाने से श्वास चला जाता है। परीक्षित है।

    👉शुद्ध नीलाथोथा १ माशे और गुड़ १ माशे-दोनों को मिला कर सात गोलियाँ बना लो । सात दिन तक बराबर एक गोली रोज़ खाने ले २० वर्ष का पुराना दमा भी चला जाता है ।
    नोट- पहले तीन दिन उपद्रव होंगे; यानी दस्त और कय होंगे, जी घबरायेगा, और दाह होगा । जब बहुत ही बेचैनी हो, तब मूँग चावल की खिचड़ी में आध पाव घी डाल कर रोगी को खिला दो । ३ दिन के बाद चौथे दिन दस्त, कय और बेचैनी न रहेगी; इसलिए पहले दिन ही घबराकर दवा मत छोड़ देना । ३ दिन दुःखदायी हैं; पर परिणाम में परम सुखदायी हैं।

    👉कायफल की छाल के रस में राई मिला कर खाने से श्वास आराम हो जाता है। परीक्षित है ।


    👉एक माशे जायफल और एक माशे लौंग के चूर्ण में ३ माशे शहद और १ रत्ती वंगभस्म मिला कर खानेसे श्वास चला जाता है। परीक्षित है।

    👉आक का नर्म से नर्म छोटा पता नग १ पान में रख कर खाओ । तीन दिन तक एक-एक पत्ता खाओ । तीन दिन के बाद हर दिन आधा-आधा पत्ता नित्य बढ़ाओ। इस तरह ४० दिन पत्ते खाने से श्वास में अवश्य आराम हो जाता है। -परीक्षित है।

    👉गाय, हाथी, घोड़ा, सूअर, ऊँट, गधा, मैड़ा और बकरा इन जानवरों की विष्ठा मै से किसी एक की विष्ठा का रस निचोड़कर और उसमें शहद मिलाकर चाटने से श्वास रोग चला जाता है। जिसके गले और छाती कफ बहुत ही अधिक हो, उसको यह नुसखा उत्तम है।

    👉छोटी इलायची के बीज १ माशे और मालकांगनी १ माशे - दोनों को बिना चबाये ही निगल जानेले ११ दिन में दमा जाता रहता है।

    👉आक के पके हुए पीले पत्ते, जो अपने आप जमीन में गिर गये हों, एक सेर ले आओ। एक तोले चूना और १ तोले सेंधा- नोन पानी के साथ पीस कर, उन पतों दोनों तरफ सीप दो और छायामे सुखा लो। फिर उन पत्तों को एक हाँडी में भर कर, हांडी का मुँह बंद कर दो। फिर कण्डों की आगमें हाँडी को रख कर ३ घण्टे तक पकाओ । पीछे शीतल होने पर हाँडी ले भस्म को निकाल लो।
    इसमें से १ रती भस्म पानमें रख कर नित्य खानेसे श्वास रोग 'चला जाता है । परीक्षित है।

    👉अडूसे के बीज, नकछीकनी और बँगला पान - इनको बराबर बराबर लेकर आग पर भून लो और रख लो। इसमें से चार रत्ती दवा बँगला पान में रख कर रोज़ सवेरे, खाने से भयंकर 'श्वास रोग भी नष्ट हो जाता है। इस दवा के अजीब फायदे को देख कर रोगी चकित हो उठता है। -परीक्षित है ।

    👉"सुश्रुत" में लिखा है, गाय के गोबर का रस या घोड़े की लीदका रस "शहद और पीपर" मिला कर चाटने से श्वास और खाँसी आराम हो जाते हैं।

    👉आंवला और छोटी कटेरी समान समान लेकर पीस लो। फिर उसमें आधी हींग मिला दो इसको शहद के साथ चाटने से श्वास रोगी ३ दिन मै जबर्दस्ती आराम हो जाता है।

    👉अलसी ३ माशे और इस्पन्द ३ माशे दोनोंको पीस कर 'और १ तोले शहद में मिला कर, हर दिन चाटने से छाती और गले का कफ नाश होकर दमा आराम हो जाता है। परीक्षित है।

    👉३ तोले भुना हुआ सुहागा, चार तोले शहद में मिला कर रखदो। इसमें से ३ माशे दवा रात को सोते समय चाटने से १५. - दिन में श्वास जाता रहता है । परीक्षित है।




    श्वास रोग में पथ्या पथ्य 

    अस्थमा में क्या खाएं | अस्थमा में पथ्य

    विरेचन(जुलाब देना), स्वेदन (पसीने निकालना), धूमपान कराना यानी धूआँ पिलांना(सिगरेट का नहीं), वमन किर्या (उलटी कराना), दिन में सुलाना, छातीसे लेकर दोनों पसवाड़ा.में दागना, दोनों हाथों की बीचकी उँगलियों में गरम लोहे से दागना अथवा कंठ कूप में दागना, ये सब श्वास में पथ्य हैं।

    पुराने साँठी चावल, लाल शालि चावल, गेहूँ, जौ, पुराना घी, बकरी का दूध-धी, शराब, शहद , परवल और पका कुम्हड़ा ये सब पदार्थ पथ्य हैं।

    ख़रगोश, मोर, तीतर, लवा, मुर्गा और अनूप देशके हिरन आदि  का मांस पथ्य हैं।

    बथुआ, चौलाई, जीवन्ती मूली, पोई का साग, बैंगन, लहसुन, जमीरी निम्बू, कुंदरू, बिजौरा निम्बू, दाख, छुहारे और छोटी इलायची- ये सब पथ्य हैं ।

    कटाई, हरड़, पोहकरमूल, त्रिकुटा(सोंठ , काली मिर्च, पीपर), गोसूत्र और गरम पानी – ये सब पथ्य हैं।

    दिन में पुराने चावलों का भात, मूंग-मसूर की दाल, परवल, करेला और पके कुम्हड़े का साग, बकरी का दूध, खजूर, अनार, आंवला और मिश्री आदि पथ्य है लेकिन पचाने की ताकत अच्छी हो । रात को गेहूँ की रोटी और परवल आदि की तरकारी पथ्य है। रात को कम और खूब हलका भोजन हित हैं।



    अस्थमा में क्या ना खाएं | अस्थमा में अपथ्य


    मूत्र, डकार, प्यास और खाँसी के वेगको रोकना, नस्य सूंघना, गुदामें पिचकारी समाना, दाँतुन करना, ज्यादा मेहनत करना, राह में भोझ लेकर चलना, धूल का गले में जाना, धूप में रहना अपथ्य हैं। 

    देर से पचने वाले  पदार्थ खाना, कलेजे में जलन करने वाली चीजें खाना, अनूप देश - बंगाल आदि पशु-पक्षियों का मांस खाना, तेल की भुनी चीजें खाना, चौला और उड़द कफकारी पदार्थ खाना अपथ्य हैं। 

    खून निकालना, पूरची हवा में घूमना, बहुत पानी पीना, भेड़ का घी और दूध, मैला जल, मछली, ' कन्दों के साग, सरसों, रूखे, शीतल और भारी खाने-पीने के पदार्थ श्वास रोग अपथ्य हैं।

    बहुत मिहनत, शोक, क्रोध, चिन्ता-फिक्र, रात में जागना, दही, लालमिर्च, अमचूर, जियादा देर से पचने वाला खाना और ख़ासकर रात को जियादा खाना - ये सब श्वास रोगमें बहुत ही हानिकारी हैं ।


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